बाढ़ में बह गए सैकड़ों भारतीयों के काले धन के रिकॉर्ड, क्या विदेशी बैंकों की साजिश है ये?

दिल्ली। 2014 के लोकसभा चुनाव में काले धान की वापसी एक बड़ा मुद्दा था। मोदी सरकार ने लोगों से वादा किया था कि विदेशों में जितना काला धन जमा है अगर उसे वापस लाया जाए तो हर भारतीय के खाते में 15 लाख चला जाएगा। लेकिन बाद में इसे जुमला करार दे दिया गया। अब इस मुहिम को एक और बड़ा झटका लगा है। कैरिबियन द्वीप समूह के अधिकारियों ने भारत को कह दिया है कि 2017 में आए बाढ़ के दौरान भारतीयों के सारे खाते का रिकॉर्ड बाढ़ में बह गए हैं।

बाढ़ में बहे काले धन के रिकॉर्ड?

दरअसल, मोदी सरकार के गठन के बाद पहली ही कैबिनेट में कालेधन की जांच के लिए एसआईटी गठित की गई थी। जांच के दौरान कुछ कामयाबी भी मिली थी। लेकिन कालेधन रखने वाले लोगों के नाम के खुलासे अभी तक नहीं हुए हैं। ऐसे में विदेश से कालाधन लाने की मुहिम को जोरदार झटका लगा है। इनकम टैक्स विभाग के पास मौजूद जानकारी के अनुसार कैरिबियन द्वीप समूह में स्थित ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड के बैंकों में सैकड़ों भारतीयों के कालाधन जमा है। जब आयकर विभाग ने उन भारतीयों की सूची वापस लाने की कोशिश शुरू की तो वर्जिन आइलैंड के अधिकारियों ने यह कहते हुए उन भारतीयों की सूची देने से इनकार कर दिया कि पिछले साल बाढ़ में सारे रिकॉर्ड बह गए।

भारतीय आयकर विभाग को उनकी तरफ से बताया गया कि पिछले साल अगस्त में वहां बाढ़ आई थी जिसमें निवेशकों के सारे दस्तावेज बह गए। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इनकम टैक्स विभाग की एक टीम ने कालेधन की सूची के लिए ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड के अधिकारियों से मुलाकात की थी। लेकिन 2013 में हुए इस मुलाकात के दौरान कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकलता था। कहा जाता है कि वर्जिन आइलैंड को निवेश के लिए काफी मुफीद जगह माना जाता है, जहां स्विस बैंक से अधिक सुरक्षा है।

पनामा पेपर्स में हुआ था खुलासा

पिछले दिनों पत्रकारों के अंतर्राष्ट्रीय खोजी समूह आईसीआईजे ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा था कि भारत के 612 नागरिकों ने ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड में बड़े पैमाने पर निवेश कर रखा है। सिर्फ भारतीयों ने अपने काले धन को वर्जिन या स्विस बैंक ही नहीं रखे हैं। पनामा खुलासे और पैराडाइज खुलासे में भारतीयों द्वारा यहां धन छुपाए जाने की बात सामने आई थी। खबरों के अनुसार ब्रिटिश वर्जिन समेत पांच देशों से इस साल की शुरुआत में अपने नागरिकों के निवेश से संबंधित जानकारी मांगी थी। लेकिन नहीं मिलने की वजह से कालेधन की जांच कर रहे एजेंसी को जोरदार झटका लगा है।

विदेशी बैंकों की साजिश तो नहीं?

हालांकि कहा जा रहा है कि विदेशी बैंक एक साजिश के तहत ऐसी दलील दे रहे हैं। क्योंकि जिन जगहों पर काले धन छुपाए गए हैं, उन बैंकों के कारोबार ब्लैक मनी पर ही निर्भर है। ऐसे में वे सूचनाएं सार्वजनिक नहीं करते हैं। कहा जाता है कि जो छोटे द्वीपीय देश हैं, उनकी अर्थव्यव्स्था ही इस पर टिकी है इसलिए लगातार टालमटोल करते आए हैं। वहीं, स्विट्जर लैंड और भारत के बीच 2016 में एक करार हुआ था कि टैक्स चोरी रोकने के लिए एक दूसरे के बैंक खातों की जानकारी साझा करेंगे। लेकिन अगस्त 2017 में स्विटजरलैंड की सबसे बड़ी पार्टी स्विस पीपुल्स पार्टी ने ऐसे डाटा देने का विरोध करना शुरू कर दिया।

ऐसे में अनुमान यह भी लग रहे हैं कि अगर काले धन की सूची सार्वजनिक होती है तो कई बड़े चेहरे बेनकाब हो जाएंगे। क्योंकि पनामा और पैराडाइज पेपर में भारत के कई चेहरे सामने आए थे। ऐसे में इनसे बचने के लिए भारत के अधिकारी और नेता भी खेल कर सकते हैं। क्योंकि हमेशा इस लेकर कोई न कोई अड़चन आ ही जाती है। दरअसल, साजिश की बात इसलिए भी उठ रही है कि केंद्रीय सूचना आयोग ने 16 अक्टूब को एक आदेश पारित किया था जिसमें पीएमओ से 15 दिनों के भीतर काले धन का ब्यौरा मुहैया कराने के लिए कहा गया था। इसी के जवाब में पीएमओ ने सूचना देने से इनकार कर दिया था।

रेहड़ी-पट्टी

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