बिहार से अमेरिका तक साइकिल क्यों है सियासत की ‘धुरी’?

आज भी साइकिल सियासत की 'धुरी'

पटना। बिहार में लालू की विरासत संभाल रहे छोटे ‘लाल’ की साइकिल पंक्चर हो गई. बारिश ने उनके ‘यात्रा’ धो डाला. बोधगया वाया जहानाबाद पटना आनेवाले थे. पूरे रास्ते नीतीश सरकार के खिलाफ ‘माहौल’ बनाते. उससे पहले इंद्र देवता ने उनकी मंशा पर पानी फेर दिया. पहले की तरह आज भी साइकिल सियासत की ‘धुरी’ बनी हुई है.

आज भी साइकिल सियासत की ‘धुरी’

आज जो आप साइकिल देख रहे हैं उसे 1839 में स्कॉटलैंड में किर्कपैट्रिक मैकमिलन नाम के शख्स ने बनाया था. पहले इसमें चेन नहीं थी. बैठ कर पैर से पीछे की तरफ धकेला जाता था, फिर वो आगे बढ़ जाती थी. बाद में मैकमिलन ने इसमें पहिये को पैरों से चला सकने योग्य बनाया. तब से लेकर अब तक साइकिल के डिजाइन में बहुत बदलाव हुए. मगर मूल फ्रेम में कोई खास तब्दीली नहीं की गई. सियासत में भी साइकिल का इस्तेमाल लंबे समय से हो रहा है.

कभी साइकिल पर बैठ कर सियासत की जाती है तो कभी साइकिल चलाकर. कभी साइकिल को चुनाव चिन्ह बनाकर. कई बार साइकिल के पहिया को विकास से भी जोड़ दिया जाता है. मगर नीतीश कुमार ने साइकिल बांट कर सियासत की. जिनसे लालू के ‘लाल’ का पाला पड़ा है. 2007 से साइकिल इतना बांट चुके हैं कि बिहार का शायद ही कोई घर होगा (शहरों में कुछ घर छोड़कर) जहां नीतीश की साइकिल न पहुंची हो.

अगर बच्चों को साइकिल मिली है तो उसका इस्तेमाल बच्चों के पिता भी करते हैं. घर का सामान भी बाजार से साइकिल पर आता है. ऐसे में साइकिल यात्रा से तेजस्वी नीतीश के खिलाफ कुछ खास कर पाएंगे कहना मुश्किल है. मीडिया में खबर जरूर बना सकते हैं.

रणनीति का पहला ‘औजार’ साइकिल

बिहार में पिछले 11 साल से सियासत की धुरी साइकिल रही है. नीतीश कुमार ने 2007 में साइकिल योजना की शुरुआत की थी तो इसे बड़ी उपलब्धि बताते थे. आज भी बताते हैं. सियासत में जब भी सरकार के खिलाफ कोई रणनीति बनाई जाती है तो उसमें सबसे पहला ‘औजार’ साइकिल ही होती है.

जो आज तेजस्वी यादव कर रहे हैं इससे पहले उनके पापा लालू प्रसाद कर चुक हैं. भले ही इस दिखावे में सैकड़ों पुलिस के जवान साइकिल के आगे-पीछे हांफते रहते हैं. मीडिया वाले बेचारे फोटो और वीडियो के चक्कर में पसीने बहाते रहते हैं. हांफते गिरते पड़ते किसी तरह ‘माहौल’ को कैमरे में उतारना चाहते हैं.

…जब गच्चा खा गए लालू के ‘लाल’

बिहार ही नहीं देश के तकरीबन हर राज्य में साइकिल सियासत की धुरी बनी रहती है. देश तो छोड़ दीजिए विदेश तक की सियासत में साइकिल का क्रेज है. घर में जब बच्चा थोड़ा बड़ा होता है तो अपना पैर संभालने लगता है तो सबसे पहले उसके बर्थडे साइकिल खरीदने का प्लान होता है. वो सबसे पहले साइकिल पर आपका कॉन्फिडेंस बिल्ड-अप करता है. इसके बाद साइकिल की साइज बढ़ती चली जाती है.

साइकिल में सबसे खास बात इसकी फ्रेमिंग होती है. एक भी कल-पूर्जा ढीला पड़ा तो फिर मुसीबत है. अगर सियासत को साइकिल मान लीजिए तो सोच लीजिए लाखों की कार और सियासी रुतबा के लिए साइकिल कितना जरूरी है. नीतीश से लेकर तेजस्वी और लालू से लेकर अमेरिकी विदेश मंत्री रह चुके जॉन केरी तक इसके अहमियत समझते हैं.

तभी तो लाखों की कार के मालिक लालू के बड़े ‘लाल’ पटना की सड़कों पर साइकिल से अलख जगाने के दौरान ‘धोखा’ खा गए. उनके छोटे भाई तेजस्वी यादव साइकिल चलाने के लिए बोधगया गए, मगर वहां भी कामयाबी नहीं मिली. लालू के दोनों ‘लाल’ साइकिल चलाने के लिए बेचैन हैं, मगर कुछ न कुछ ऐसा हो जाता है कि उनकी मंशा पर पानी फिर जा रहा है.

बेटों को लालू से चाहिए ‘सियासी टिप्स’

कहा जाता है कि शायद समय-काल-परिस्थिति जब अनुकूल न हो तो कुछ दिनों के लिए वो काम छोड़ देना चाहिए, फिर बेहतर समय का इंतजार करना चाहिए. मगर नौजवान खूनों को सब्र कहां है. उनको लगता है कि सबको रौंदकर आगे चले जाना चाहिए. कहीं पढ़ लिए होंगे की अगर आपमें दृढ़ इच्छा शक्ति हो तो कुछ भी हासिल कर सकते हैं. इसी फिराक में तेजप्रताप और तेजस्वी हमेशा लगे रहते हैं.

लग रहा है लालू जी अपनी सियासी टिप्स अपने बेटों को नहीं दे रहे हैं. या फिर उनके बेटे उनके अनुभव को ‘भाव’ नहीं दे रहे हैं. हड़बड़ी में प्लानिंग कर लेते हैं मगर कामयाबी नहीं मिल पा रही है. इसी का नतीजा है कि लालू के बड़े बेटे तेजप्रताप पटना में साइकिल चलाने की नुमाइश के दौरान अपनी ही सिक्योरिटी वाली गाड़ी से टकरा गए. बाद में टीवी वालों से गुजारिश करने लगे की प्लीज निगेटिव खबर मत बनाइएगा.

जबकि बौद्ध मंदिर में सियासी ‘ज्ञान’ प्राप्त करने निकले छोटे बेटे तेजस्वी यादव को अपनी साइकिल यात्रा को रद्द करना पड़ा. अब तक दोनों भाई लालू प्रसाद के नाम खप जा रहे हैं मगर जैसे ही इस बेदर्द सियासत से सामना होगा, उस वक्त जो आज अपना दिख रहा है वो सबसे बड़ा दुश्मन नजर आने लगेगा. ऐसे में घर में साइकिल चलाना और सड़क पर साइकिल चलाना दोनों ही अलग-अलग बात है. अगर आप एक्सपर्ट नहीं हैं तो कम से कम सियासत की ‘साइकिल’ का पैंडल नहीं मार सकते हैं. वो भी तब जब आपके सामने एक से बढ़कर एक सियासी घाघ हों.

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