…तो बिहार में ‘चेहरा’ और ‘सीट शेयरिंग’ के पीछे इनका आइडिया था?

...तो बिहार में 'चेहरा' और 'सीट शेयरिंग' के पीछे इनका आइडिया था?

दिल्ली। नीतीश कुमार के ‘खेवनहार’ (रणनीतिकार प्रशांत किशोर) का आइडिया फिर काम कर गया. प्रशांत किशोर ने जेडीयू नेताओं को नीतीश कुमार के ‘चेहरे की चमक’ तेज करने के लिए सुझाव दिए थे, जो काम कर गया. बात ‘सीट शेयरिंग’ तक पहुंच गई.

‘चेहरा’ और ‘सीट शेयरिंग’ का ‘नया’ आइडिया

बिहार विधानसभा के 2015 वाले चुनाव में ‘बिहार में बहार हो नीतीशे कुमार’ हो का नारा काफी सुर्खियों में रहा था. नीतीश कुमार को दोबारा सत्ता में वापसी काफी मजबूती से हुई थी. बीजेपी के विजय रथ को नीतीश कुमार ने बिहार में रोक दिया था. तब देश-दुनिया में काफी सुर्खियां बटोरी थी. इसके बाद हालात बदले और नीतीश कुमार एक बार फिर से एनडीए के पाले में चले गए. मगर ‘चेहरा’ और ‘सीट शेयरिंग’ का दांव काम कर गया.

बीजेपी के नेता खुलकर नीतीश कुमार के खिलाफ कुछ बोल नहीं पाए. जबकि जेडीयू के नेता खुलकर अपनी बात मीडिया में रखते रहे. इससे एनडीए में नीतीश कुमार का कद बढ़ गया. इस बात को बीजेपी के नेताओं ने कैमरे पर स्वीकार किया. हालांकि उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी अब तक ‘चेहरे’ और ‘सीट शेयरिंग’ को खुले मन से स्वीकार नहीं कर पाई है. जबकि बिहार एनडीए के दूसरे पार्टनर रामविलास पासवान की पार्टी खुलकर कुछ भी कहने की हालत में नहीं है. उसे नीतीश कुमार न तो उगलते बन रहे हैं और ना ही निगलते.

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प्रशांत किशोर से नीतीश कुमार की 2-2 मुलाकातें

हाल के दिनों में प्रशांत किशोर के साथ एक नहीं बल्कि 2-2 मुलाकातें कर डाली है. अब हालात बदल चुके हैं. अब नीतीश कुमार एनडीए के पार्ट हैं और एनडीए में अपना कद बढ़ाना चाहते हैं. ऐसे में उनको अपने ‘चुनावी माझी’ की याद आने लगी है. 2019 लोकसभा चुनाव में जेडीयू की कमान को प्रशांत संभाल सकते हैं. खबरों के मुताबिक नीतीश और प्रशांत किशोर की 2 मुलाकतें हो चुकी है. हाल ही में पटना में हुए जेडीयू की बैठक में भी प्रशांत किशोर मौजूद थे. 2019 के लिए प्रशांत किशोर को जेडीयू कमान देना चाह रही है.

2014 लोकसभा चुनाव में पहली बार प्रशांत किशोर का नाम सामने आया था. उस दौरान उन्होंने बीजेपी के लिए काम किया था. इस चुनाव में बीजेपी को रिकॉर्डतोड़ सफलता मिली थी. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक प्रशांत किशोर का जेडीयू के लिए काम करने पर तैयार होना कांग्रेस के लिए नुकसानदायक हो सकता है. क्योंकि प्रशांत किशोर यूपी और पंजाब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए काम कर चुके हैं. मगर खबर ये भी है कि दोनों ही चुनाव में प्रशांत किशोर को काम करने की ‘खुली छूट’ नहीं मिली.

‘बिहार एनडीए का सबसे बड़ा नेता नीतीश’

‘बिहार में बहार हो नीतीश कुमार हो’ नारा 2015 विधानसभा चुनाव में काफी सुर्खियों में रहा था. कांग्रेस छोड़कर जेडीयू में आए अशोक चौधरी ने कहा कि नीतीश कुमार के लीडरशिप को छोड़कर बिहार में 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ा गया तो एनडीए को काफी नुकसान होगा. ये सवाल ही नहीं उठता है कि नीतीश को बिहार में एनडीए के चेहरे के तौर पर पेश न किया जाए. उनका नेतृत्व स्वीकार करना ही पड़ेगा. बिहार एनडीए में उनसे बड़ा कोई नेता नहीं है.

नीतीश कुमार के साथ प्रशांत किशोर के आने से 2015 विधानसभा चुनाव में काफी फायदा हुआ था. जबकि सालभर पहले हुए लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार की हार हुई थी. उनकी पार्टी महज 40 में से महज 2 सीटें जीत पाई थी. बिहार विधानसभा चुनाव के बाद कुर्ता-पायजामा में प्रशांत किशोर के साथ नीतीश कुमार की तस्वीरें मीडिया में काफी सुर्खियां बटोरी थी. जीत के बाद पहले प्रेस कॉन्फ्रेंस में लालू प्रसाद ने प्रशांत किशोर का जिक्र किया था. उस वक्त प्रशांत किशोर का कद काफी बड़ा हो गया था.

2015 में राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस और जनता दल यूनाइटेड को मिलाकर महागठबंधन बनाने में भी प्रशांत किशोर का अहम रोल था. चुनाव में जीतने के बाद सीएम नीतीश कुमार ने प्रशांत किशोर को राज्य मंत्री का दर्जा दिया था. मगर महागठबंधन टूटने के बाद बीजेपी के साथ बनी नई सरकार ने उन्हें पद से हटा दिया.

अमित शाह की टीम ने नहीं दी तरजीह

2012 से ही प्रशांत किशोर को नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने की रणनीति पर काम कर रहे थे. 2014 चुनाव में प्रशांत किशोर ही नरेंद्र मोदी के लिए ‘चाय पे चर्चा’, युवाओं के बीच ‘मंथन’, ‘3डी रैली’ और ‘भारत विजय रैली’ जैसे कार्यक्रम कराए थे. ये सभी कार्यक्रम कामयाब रहे थे. मगर जीत की क्रेडिट मोदी और शाह को मिला. माना जाता है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की जीत के बाद अमित शाह ने जिस तरह प्रशांत किशोर की उपेक्षा की, उसका जवाब उन्होंने 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन की बड़ी जीत के दिया.

रणनीतिकार प्रशांत किशोर की निजी जिंदगी

प्रशांत किशोर के निजी जिंदगी के बारे में बहुत कम जानकारी मिलती है. मीडिया में जो जानकारी है उसके मुताबिक प्रशांत किशोर बिहार के बक्सर के रहनेवाले हैं. उनके पिता श्रीकांत पाण्डेय पेशे से डॉक्टर हैं और बक्सर में अपना क्लीनिक चलाते हैं. वहां पर उनका घर भी है. प्रशांत के बड़े भाई अजय किशोर पटना में रहते हैं और खुद का बिजनेस है.

इसके अलावा उनके परिवार में 2 बहनें हैं. जानकारी के मुताबिक प्रशांत ने इंटरमीडिएट की पढ़ाई पटना के प्रतिष्ठित साइंस कांलेज से की है. उसके बाद उन्होंने हैदराबाद के एक कॉलेज से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की. फिर अफ्रीका में यूएन हेल्थ एक्सपर्ट के तौर पर काम किया. नौकरी छोड़कर प्रशांत 2011 में इंडिया लौटे. फिर 2012 से 2014 तक मोदी के लिए ‘इमेज रिपेयर’ के तौर पर काम किया. एक बच्चे के पिता प्रशांत किशोर का परिवार ज्यादातर वक्त दिल्ली में रहता है.

आईपैक के पास फिलहाल आंध्र प्रदेश का काम

इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी कंसल्टिंग प्राइवेट लिमिटेड के तहत प्रशांत किशोर की टीम काम करती है. जिसका ब्रांड नेम आईपैक है. इसमें कई प्रोफेशनल्स दिन-रात काम करते हैं. ज्यादा आईआईटी और आईआईएम पास आउट है. इसका रजिस्टर्ड ऑफिस हैदराबाद में है. फिलहाल आईपैक की टीम 2019 चुनाव के लिए जगन मोहन रेड्डी की पार्टी वाईएसआर कांग्रेस के लिए आंध्र प्रदेश में काम कर रही है.

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