मरीना बीच पर करुणानिधि को किया गया दफन, तमिल राजनीति का अब कौन होगा अगला नेता?

तमिल राजनीति का अब कौन होगा अगला नेता?

दिल्ली। डीएमके चीफ और तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री करुणानिधि को चेन्नई के फेमस मरीना बीच पर उनके गुरु अन्नादुरई के पास दफन किया गया है। इस मौके पर उनके हजारों समर्थक और पूरा परिवार मौजूद रहा। उनका अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया गया। इस दौरान थलाइवा की याद में उनके प्रशंसकों ने जोरदार नारे लगाए। मरीना बीच का पूरा माहौल गमगीन था। इस दौरान थलाइवा की याद में उनके प्रशंकों ने जोरदार नारे लगाए।

अब कौन होगा अगला नेता?

दरअसल, पूर्व मुख्यमंत्री एमजी रामचंद्रन और उनकी बेहद करीबी जयललिता मरीना बीच पर ही दफन किए गए थे और वहीं उनके स्मारक बनाए गए। ये दोनों राजनीति में करुणानिधि के कट्टर विरोधी थे। करुणानिधि अन्नादुरई का जब निधन हुआ था, वह मुख्यमंत्री थे। वहीं, करुणानिधि के अंतिम दर्शन के लिए पीएम समेत सभी दल के दिग्गज नेता पहुंचे थे।

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जयललिता और करुणानिधि के तमिलनाडु के सियासी सीन से हटने के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि तमिल राजनीति का अगला सितारा कौन होगा। द्रविड़ आंदोलन के अग्रणी नेताओं में शामिल एम करुणानिधि के निधन से राज्य में शख्सियत आधारित द्विध्रवीय राजनीति के समाप्त होने का संकेत नजर आ रहा है। अब तक राज्य की राजनीति में पिछले पांच दशकों में चिर प्रतिद्वंद्दी द्रमुक और अन्नाद्रमुक के करिश्माई नेताओं का वर्चस्व रहा है। वे करुणानिधि और एमजीआर ही थे, जो शुरुआती दौर में लोगों के बीच प्रभावशाली रहे थे।

1969 में करुणानिधि बने थे सीएम

लेकिन साल 2016 में जयललिता और करुणानिधि, दोनों ही चर्चा में कम रहने लगे। 75 दिनों तक अस्पताल में रहने के बाद जयललिता की मृत्यु हो गई, जबकि द्रमुक प्रमुख बीमारी से ग्रसित हो गई और उससे अपने निधन तक उबर नहीं पाए। द्रमुक संस्थापक सीएन अन्नादुरई के निधन के बाद 1969 में करुणानिधि मुख्यमंत्री बने थे।

तमिलनाडु की राजनीति के विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही करुणानिधि ने चुनावी मोर्चे पर कई बार प्रतिकूल परिणामों का सामना किया हो, लेकिन वह कभी नहीं झुके। जयललिता और करुणानिधि के वर्चस्व वाले राजनीतिक परिदृश्य में विजयकांत और डीएमडीके ने चुनावों में कुछ प्रभावशाली प्रदर्शन किए। लेकिन वे अपना प्रभाव बढ़ा नहीं पाए और द्रविड़ राजीनित का द्विध्रुवीय स्वरूप बना रहा। करुणानिधि और जयलललिता के निधन के बाद राज्य की राजनीति में एक शून्य पैदा हो गया है।

रजनीकांत-कमल हसन मैदान में

राजनीति के जानकारों का यह भी मानना है कि किसी भी नेता के लिए उनके करिश्मे और राजनीतिक प्रभाव की बराबरी कर पाना एक चुनौती होगी। इसलिए राज्य में शख्सियत आधारित राजनीति का पटाक्षेप हो सकता है।
वहीं, अगर करुणानिधि और जयललिता की मौत के बाद तमिल राजनीति में पैदा हुई खाई को भरने के लिए एमके स्टालिन को छोड़ जमीन से जुड़ा कोई नेता डीएमके में तो नहीं दिखाई देता है। लेकिन फिल्मी दुनिया के दो दिग्गज रजनीकांत और कमल हासन अपनी राजनीतिक पारी शुरू करने के लिए बेताब है। रजनीकांत ने तो अपनी पार्टी बना ली है। अगामी चुनाव में चुनावी अखाड़े में उतरकर इस गैप को वो भरने की कोशिश करेंगे।

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