नोटबंदी से जनता को कुछ नहीं मिला, लेकिन बीजेपी की बढ़ गई आमदनी !

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बीजेपी की बढ़ गई आमदनी !

8 नवंबर 2016 की रात पीएम मोदी ने देश में नोटबंदी की घोषणा की। इस दौरान सब भौचक्क रह गए कि इसका मतलब क्या है। तब टेलीविजन पर पीएम नरेंद्र मोदी ने बताया कि काले धन और आंतकवाद के खात्मे के लिए देश में 500 और 1000 रुपये के नोट को अर्थव्यस्था के चलन से बाहर कर किया जा रहा है।

जनता को कुछ नहीं मिला

एक घोषणा के चंद घंटों में 86% करंसी महज कागज का टुकड़ा रह गई थी. इस दिन करीब 15.44 लाख करोड़ रुपये नोट चलन से बाहर हो गए। आम लोग महीनों तक कतार में लगे रहे। व्यापारी और छोटे उद्मी परेशान रहे।

लाखों लोग बेरोजगार हो गए। नोटबंदी के बाद ना काले धन पर नकेल कसी जा सकी और ना ही आतंकवाद पर लगाम कस पाया।

बीजेपी की बढ़ गई आमदनी !

तो सवाल है कि नोटबंदी से मिला क्या? जवाब बहस का विषय है। लेकिन एक जवाब जो सामने है वो ये कि नोटबंदी के बाद बीजेपी की आमदनी 81.18 प्रतिशत बढ़ गई।

2015-16 और 2016-17 के मुनाफे के दौरान बीजेपी की आमदनी 81.18 प्रतिशत बढ़कर 570.86 करोड़ रुपये से बढ़कर 1,034.27 करोड़ रुपये हो गई।

इसी अवधि में, कांग्रेस ने की आमदनी 14 फीसदी की गिरावट के साथ 225.36 करोड़ रुपये रह गई। अकेले बीजेपी की कुल आमदनी में राष्ट्रीय पार्टियों की कुल आमदनी की तुलना में 66.4 प्रतिशत का इजाफा हो गया।

यह देश भर में राजनीतिक दलों द्वारा आयकर रिटर्न के आधार पर दिल्ली स्थित एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिपोर्ट (एडीआर) द्वारा संकलित आंकड़ा है।

खर्च में भी दिखा अंतर

बीजेपी और कांग्रेस की आय के बीच के अंतर का असर चुनावों पर होने वाले खर्च और संसाधनों पर भी दिखा। बीजेपी ने चुनावों पर 606 करोड़ रुपये खर्च किए, जबकि कांग्रेस ने सिर्फ 149 करोड़ रुपये खर्च किए, जिसमें दोनों पार्टियों के बीच संसाधनों में भारी अंतर दिखा।

अब ज़रा आमदनी के स्र्तोत पर गौर करिए। बीजेपी को 2016-17 यानी नोटबंदी के बाद कुल आमदनी 1,034 करोड़ रुपये के 997.12 करोड़ रुपये यानी 96 फीसदी से ज्यादा राशि दान और योगदान से हासिल हुई। इसके विपरीत, कांग्रेस की 225.36 करोड़ में लगभग 116 करोड़ रुपये की राशि कूपन जारी करने से आया था।

यानी नोटबंदी के बाद बीजेपी ने अज्ञात स्रोतों से आमदनी का 96 प्रतिशत से अधिक हासिल किया है। स्वैच्छिक योगदान अज्ञात स्रोतों से हैं। जिनके नाम, पते या, पैन विवरण नहीं हैं। ऐसे में सवाल ये कि नोटबंदी के बाद अचानक इतनी संख्या में राशि दान करने वाले दानदाता कौन थे। क्या यही काला धन था?

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