अपनी पुश्तैनी जमीन बेचकर जलाते हैं रावण के पुतले, 20 फीट से 210 फीट तक का सफर

राणा तेजेंद्र की कहानी

दिल्ली। आश्विन मास की शुक्ल पक्ष को दशमी मनाया जाता है. बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है दशहरा पर्व. इस बार 19 अक्टूबर को देश के अलग-अलग हिस्सों में रावण दहन होगा. अंबाला के बराड़ कस्बे के रहनेवाले राणा तेजेंद्र चौहान का रावण भी जल जाएगा. राणा तेजेंद्र की कहानी बिल्कुल अलग है. इन्होंने अपनी इस शौक को पूरा करने के लिए 30 सालों में अब तक 12 एकड़ पुश्तैनी जमीन स्वाहा कर डाला. हर साल ये रावण दहन करते हैं और पैसों की कमी पड़ने पर अपनी पुश्तैनी जमीन को बेचने से नहीं हिचकते.

राणा तेजेंद्र की कहानी

रावण दहन की जुनून राणा तेजेंद्र चौहान पर ऐसा सवार हुआ कि उन्होंने अपनी पुश्तैनी जमीन तक बेच डाली. इसके लिए वो 6 महीने पहले से तैयारी शुरू कर देते हैं. राणा तेजेंद्र की कहानी एक दिन या एक साल की नहीं है. वो 30 सालों से ये काम करते आ रहे हैं. 20 फीट के रावण से शुरू हुआ ये सफर अब 210 फीट तक पहुंच चुका है. अपनी इस शौक को पूरा करने के लिए अब तक 12 एकड़ से ज्यादा पुश्तैनी जमीन भी बेच चुके हैं. इसके बावजूद भी इनका हौसला पस्त नहीं हुआ बल्कि साल दर साल ये बढ़ता गया.

जवानी का शौक, बुढ़ापे में परवान

राणा तेजेंद्र की कहानी

असत्य पर सत्य की विजय के खुशी में इस पर्व को मनाया जाता है. इस दिन जगह-जगह रावण दहन किया जाता है. कहा जाता है कि रावण के पुतले को जलाकर हर इंसान अपने अंदर के अहंकार और क्रोध का नाश करता है. इस दिन मां दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन भी किया जाता है. मगर राणा तेजेंद्र की कहानी जवानी के दिनों से शुरू होती है जो बुढ़ापे में भी परवान चढ़ रही है.

हर साल वो लाखों रुपए लगाकर रावण के पुतले बनवाते हैं. रावण दहन के दिन वो मिनटों में खाक हो जाता है. फिर उसकी तस्वीरों को अपने एल्बम में सजाते हैं. घर पर आने वाले मेहमानों को बड़े शान से उसे दिखाते हैं. घर फूंक तमाशा देख की ये कहानी अंबाला के बराड़ कस्बे के रहनेवाले राणा तेजेंद्र चौहान की है. जिनका मुख्य काम ही है रावण का पुतला बनवाना और उसे जलाना. अब तो उनके इस काम में परिवार वाले भी मदद करने लगे हैं.

नीलकंठ का दर्शन अति शुभ

राणा तेजेंद्र की कहानी

ऐसी मान्यता है कि रावण का वध करने से कुछ दिन पहले भगवान राम ने आदि शक्ति मां दुर्गा की पूजा की और फिर उनसे आशीर्वाद मिलने के बाद दशमी को रावण का अंत कर दिया. ऐसी भी मान्यता है कि दशमी को ही मां दुर्गा ने महिषासुर नाम के राक्षस का वध किया था. इसलिए इसे विजयादशमी के रूप में मनाया जाता है. राणा तेजेंद्र की कहानी इन्हीं कहानियों से प्रेरित है.

वो चाहते हैं कि समाज से बुराइयों का नाश हो. उनको लगता है कि रावण का पुतला जलाने से भले ही बुराइयों की पूरी तरह नाश न हो मगर इसमें कमी जरूर आएगी. देशभर में अलग-अलग जगह रावण दहन होता है. हर जगह की परंपराएं बिल्कुल अलग है. इस दिन शस्त्रों की पूजा भी की जाती है. शमी के पेड़ की पूजा भी की जाती है. इस दिन वाहन, इलेक्ट्रॉनिक्स आइटम, सोना, आभूषण नए वस्त्र खरीदना शुभ होता है. दशहरे के दिन नीलकंठ के दर्शन करना भी अति शुभ माना जाता है.

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