सियासत में एक ‘जादूगर’ से एक ‘खिलाड़ी’ को क्या सीखना चाहिए? खबर आपके काम की

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दिल्ली। ‘खिलाड़ी’ और ‘जादूगर’ में अंतर को समझना हो तो मध्य प्रदेश (Kamalnath) और राजस्थान (Ashok Gehlot) की सियासत को समझना होगा. राजपाट की ‘युद्ध’ में एक ‘खिलाड़ी’ अपना कुर्सी नहीं बचा पाया मगर ‘जादूगर’ न सिर्फ कुर्सी बचा ले गया बल्कि अपने दुश्मन को भी चारो खाने चित कर दिया. कांग्रेस में कमलनाथ को ‘खिलाड़ी’ और अशोक गहलोत को ‘जादूगर’ कहा जाता है.

Ashok Gehlot: जादूगर से ‘गिली-बिली’ तक

राजस्थान की राजनीति में Ashok Gehlot को ‘जादूगर’ के नाम से भी जाना जाता है. अशोक गहलोत इंदिरा गांधी, संजय गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी यानी पूरे गांधी परिवार की लगातार पसंद बने रहे हैं. स्वाभाविक रूप से बहुतों की आंख में गहलोत खटकते भी रहे, फिर भी उनका जादू बरकरार रहा. Ashok Gehlot को राजनीति का जादूगर इसलिए भी कहा जाता है कि उनके पिता लक्ष्मण सिंह गहलोत राजस्थान के जाने-माने जादूगर थे. पिता साथ रहते हुए अशोक गहलोत ने भी जादू की कई ट्रिक्स सीख ली थी. जादू की कला जानने की वजह से संजय गांधी और उनके दोस्त अशोक गहलोत को ‘गिली-बिली’ नाम से बुलाते थे. शुरुआती दिनों में राहुल और प्रियंका गांधी को भी अशोक गहलोत जादू दिखाया करते थे.

पॉलिटिक्स के डार्क हॉर्स की कहानी

सियासत में Ashok Gehlot की एंट्री समाज सेवा के जरिए हुई. जिस राजस्थान में जातियों की गुण-गणित इतनी की आपका मैथेमेटिक्स फेल हो जाए, वहां अशोक गहलोत अप्रभाली माली समाज से आते हैं. मगर गांधी परिवार के आंखों का तारा बने रहे. इनका सियासी करियर पॉलिटिक्स के डार्क हॉर्स की कहानी है. 26 साल की उम्र में अपने पहले चुनाव के लिए 4 हजार रुपए में मोटरसाइकिल बेच दी और हार गए. तीसरी बार राजस्थान की कमान उनके हाथों में है. ऐसे में इस सियासी जादूगर (Ashok Gehlot) के सामने सचिन पायलट नहीं चली और पाशा पलटने में अशोक गहलोत कामयाब रहे. दरअसल Ashok Gehlot को पहले से ही इस बात का आभास था कि ये हालत एक दिन आने वाली है, इसकी तैयारी वो पहले से कर रखे थे. अशोक गहलोत से सियासी दुश्मनी में सचिन पायलट इतना आगे निकल चुके हैं कि उनके लिए लौटना मुश्किल है.

मध्य प्रदेश Vs राजस्थान

मध्य प्रदेश में भी कमोबेश हालात राजस्थान (Ashok Gehlot) वाले ही थे लेकिन वहां ‘जादूगर’ नहीं बल्कि ‘खिलाड़ी’ मैदान में था. कमलनाथ सत्ता संघर्ष में मात खा गए. जबकि अशोक गहलोत विजय पताका लहरा दिए. हालांकि कुछ लोगों को मानना है कि राजस्थान और मध्य प्रदेश के हालात में काफी अंतर है, एमपी में कांग्रेस के कमजोर बहुमत था जबकि राजस्थान में हालात थोड़ी बेहतर थी. हालांकि सतर्क तो कमलनाथ भी थे, उनके साथ सियासी पैंतरों में चतुर दिग्विजय सिंह भी थे मगर कुछ भी काम नहीं आया. दरअसल कमलनाथ और दिग्विजय सिंह अंदाजा ही नहीं लगा पाए कि ज्योतिरादित्य सिंधिया पूरे लाव-लश्कर के साथ बीजेपी में चले जाएंगे. अगर इसकी थोड़ी भी भनक इन दोनों नेताओं की होती तो आज हालात कुछ और होते. यही पर लगता है कि ‘खिलाड़ी’ से ‘जादूगर’ राजनीतिक प्रबंधन में आगे है.

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