अबकी बार आरक्षण से होगा बेड़ा पार!, क्यों गाया जा रहा ‘रिजर्वेशन सॉन्ग’?

एक भारतीय नहीं, बल्कि 'वोट'

पटना। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आता जाएगा, वैसे-वैसे आप एक भारतीय नहीं, बल्कि ‘वोट’ बनते जाएंगे, वोट जो किसी ना किसी वर्ग के वोटबैंक का हिस्सा होगा। आपकी पहचान आपकी जाति, आपका धर्म या मजहब होगा। कोई सवर्ण होगा..कोई पिछड़ा होगा…कोई अल्पसंख्यक होगा…कोई ओबीसी होगा..क्योंकि सियासी दस्तूर यही है..यही होता आया है और यही एक बार फिर हो रहा है।

एक भारतीय नहीं, बल्कि ‘वोट’

2019 चुनाव नजदीक है…सो आपके धर्म और जाति के आधार पर सियासदानों को आपकी चिंता अचानक सताने लगी है। कोई सवर्ण के लिए आरक्षण का राग अलाप रहा है….कोई दलितों के लिए आरक्षण बढ़ाने की मांग कर रहा है..तो अब गरीब मुसलमानों के लिए आरक्षण का राग छेड़ा गया है। हालांकि सियासी राग नया नहीं….पिछले चुनाव के दौरान नेताओं के बयान ढूंढ कर सुन लीजिए….यही राग सुनने को मिलेगा…लेकिन चुनाव जीतने के बाद 5 साल तक फिर खामोशी। इसीलिए सवाल उन बयानवीरों से जो गरीब मुसलमानों के लिए आरक्षण पर कोरी बयानबाजी तो करते हैं..लेकिन सच्चर और रंगनाथ मिश्रा की रिपोर्ट पर चु्प्पी साध लेते हैं।

सियासत में आरक्षण का ‘खेल’

2007 में रंगनाथ मिश्रा आयोग ने अल्पसंख्यकों को आरक्षण की सिफारिश की थी। आयोग ने अल्पसंख्यकों को 15 फीसदी आरक्षण, जिसमें मुसलमानों को अकेले 10 फीसदी आरक्षण की सिफारिश की गई थी। लेकिन 2007 से 2018 तक रंगनाथ मिश्रा आयोग की रिपोर्ट पर कोई ठोस पहल नहीं हुई। हां यूपी चुनाव के वक्त दिसंबर 2011 में जरूर यूपीए सरकार ने मुसलमानों को लुभाने के लिए आरक्षण का फैसला आनन फानन में लिया। बिना संसद गए महज एक मेमोरेंडम के ज़रिए ओबीसी के लिए 27 % आरक्षण के भीतर अल्पसंख्यकों को 4.5 % आरक्षण देने का फैसला लिया गया।

आनन-फानन में लिए गए इस विवादित फैसले पर आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने रोक लगा दी। जिसे केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। लेकिन वहां भी उसे मुंह की खानी पड़ी। जून 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने भी केंद्र को फटकार लगाते हुए फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया और एक बार फिर मुसलमानों को आरक्षण ठंडे बस्ते में चला गया। वहीं 2005 में गठित सच्चर रिपोर्ट पर भी कोई ठोस पहल नहीं हुई। 403 पेज की रिपोर्ट को 30 नवंबर, 2006 को लोकसभा में पेश किया गया था। जिसमें मुसलमानों की स्थिति को अनुसूचित जाति-जनजाति से भी खराब बताया गया। मगर चुनाव आते ही आप एक भारतीय नहीं, बल्कि ‘वोट’ बन जाते हैं. इस रिपोर्ट में मुसलमानों की स्थिति में सुधार के लिए कई सिफारिशें की गईं, जिस पर अब तक ठोस पहल नहीं हुई।

सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में क्या है?

अब ज़रा सच्चर कमेटी रिपोर्ट के मुताबिक मुसलमानों की हालत समझिए। रिपोर्ट के मुताबिक 31 फीसदी मुस्लिम आबादी गरीबी रेखा से नीचे हैं। 38.4 फीसदी शहरी मुस्लिम आबादी गरीबी रेखा से नीचे हैं। महज 66 फीसदी मुस्लिम आबादी साक्षर हैं, जबकि देश का औसत 74 फीसदी है। 6 से 14 साल की उम्र के 25 फीसदी बच्चे स्कूल नहीं जा पाते स्कूलों में नामांकन कराने वाले 80 फीसदी शहरी मुस्लिम छात्र हैं, जबकि 68 फीसदी मुस्लिम लड़कियों का स्कूल में नामांकन हुआ। इनमें सिर्फ 3.4 फीसदी मुस्लिम आबादी ग्रैजुएट हैं। वहीं मुस्लिमों में बेरोजगारी दर 7.7 फीसदी है। रेगुलर वेज/सैलरी जॉब में 31.2 फीसदी मुस्लिम की हिस्सेदारी है। सरकारी नौकरियों में 4.9 फीसदी मुस्लिम आबादी है। जिनमें सिर्फ 3 फीसदी आईएएस और 4 फीसदी आईपीएस मुस्लिम हैं। पुलिस बल में मुसलमानों की भागीदारी 7.63 फीसदी है। रेलवे में 4.5 प्रतिशत मुसलमान हैं, जिनमें से 98.7 प्रतिशत निचले पदों पर हैं।

बिहार में आरक्षण का ‘गुणा-गणित’

अब जिस बिहार में लालू, नीतीश से लेकर कांग्रेस तक मुसलमानों का हिमायती होने का दावा करते हैं, उस बिहार में मुसलमानों की हालत समझिए। 2004 में बिहार अल्पसंख्यक आयोग ने एक सर्वेक्षण कराया था। जिसके मुताबिक क़रीब आधे मुसलमान ग़रीबी रेखा से नीचे हैं। गांवों में रहने वाले क़रीब 28 फीसदी मुसलमान आबादी भूमिहीन मज़दूर हैं। 2001 की जनगणना के मुताबिक़, मुस्लिम में साक्षरता दर केवल 42 फ़ीसदी है। इसके अलावा 2016 में मुसलमानों पर Centre for Health and Resource Management की रिपोर्ट आई थी।

तत्कालीन अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री अब्दुल गफूर ने ये रिपोर्ट जारी की थी। जिसके मुताबिक बिहार में मुसलमानों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिलतीं। सिर्फ 42 फीसदी मुसलमान सरकारी अस्पतालों में जाते हैं। सिर्फ 47 फीसदी गर्भवती मुस्लिम महिलाओं को आंगनबाड़ी केंद्र से राशन मिलता है। 84 फीसदी गर्भवती महिलाओं को अस्पताल जाने के लिए सरकारी एंबुलेंस नहीं मिलतीं। मगर चुनाव दौरान आप एक भारतीय नहीं बल्कि, ‘वोट’ बन जाते हैं. चुनाव खत्म होते ही मुद्दे भी कहीं गुम हो जाते हैं.

साफ है मुसलमानों की हालत में सुधार हुआ नहीं, लेकिन मुसलमानों की हालत में सुधार के दावे और आरक्षण के ज़रिए उन्हें लुभाने की कोशिश होती रही। ये इसीलिए क्योंकि वोटबैंक के नज़रिए से मुसलमान बिहार की सियासत में निर्णायक भूमिका अदा करते हैं। बिहार में मुसलमान की आबादी क़रीब 17 फ़ीसदी है। 243 विधानसभा क्षेत्रों में से क़रीब 50 सीटों पर मुसलमानों के वोट निर्णायक माने जाते हैं। इन क्षेत्रों में मुसलमानों की आबादी 18 से 74 फीसद तक है। 13 लोकसभा क्षेत्र में मुसलमानों की आबादी 18 से 44 फ़ीसदी के बीच हैं। किशनगंज लोकसभा क्षेत्र में सबसे ज्यादा 69 फ़ीसद मुसलमान हैं।

आरक्षण एक ‘चुनावी’ राग

2019 चुनाव नजदीक है, सो एक बार फिर सियासी दल अपने-अपने हिसाब से नागरिकों को वोटबैंक के नज़रिए से देखने लगे हैं और उस वोट बैंक को लुभाने के लिए आरक्षण का पुराना राग अलापने लगे हैं, लेकिन इसे लागू क्यों नहीं किया गया, ना इसका किसी के पास ठोस जवाब है और ना ही इसे लागू किए जाने को लेकर किसी के पास कोई ठोस प्लान हैं। ऐसे में आज इन राजनीतिक पार्टियों के लिए एक भारतीय नहीं, बल्कि ‘वोट’ बनते जा रहे हैं.

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