एक बार फिर से ‘हृदय परिवर्तन’ की दहलीज पर खड़े हैं ‘सुशासन बाबू’?

एक बार फिर से 'हृदय परिवर्तन' की दहलीज पर खड़े हैं 'सुशासन बाबू'?

पटना। क्या नीतीश कुमार एक बार फिर से कुछ ‘अलग’ करनेवाले हैं? या फिर लोकसभा सीटों के लिए प्रेशर पॉलिटिक्स कर रहे हैं? जब खुद बीजेपी के नेता देश में हो रहे सभी कामों के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को क्रेडिट देते हैं तो नीतीश कुमार उन्हें इग्नोर क्यों कर रहे हैं? इसकी बानगी नीतीश कुमार की कुछ हालिया ट्वीट है.

लंगर को जीएसटी मुक्त करने की क्रेडिट जेटली को

लंगर में जीएसटी से छूट देने पर नीतीश कुमार ने ट्वीट किया कि ”लंगर में उपयोग की जानेवाली राशन सामग्रियों पर जीएसटी के तहत छूट देने के हमारे अनुरोध को मानने और इस सकारात्मक पहल के लिए केंद्र सरकार को धन्यवाद एवं आभार”.

इसके लिए उन्होंने केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली को धन्यवाद दिया. हालांकि अरुण जेटली अभी बीमार हैं और उनकी जगह पर वित्त मंत्रालय पीयूष गोयल संभाल रहे हैं. इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कोई जिक्र नहीं है.

हालांकि जेडीयू का कहना है कि अरुण जेटली और नरेंद्र मोदी कोई अलग नहीं हैं दोनों ही सरकार के पार्ट हैं. इसलिए दूसरे एंगल से नहीं देखना चाहिए.

विशेष राज्य का दर्जा वाले ट्वीट में मोदी का जिक्र नहीं

दूसरा ट्वीट भी देखें तो इसका भी यही हाल है 29 मई को नीतीश कुमार ने एक बार फिर से बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग की. इसके लिए उन्होंने 2 पन्ने की चिट्ठी अपने ऑफिसियल ट्वीटर हैंडल से ट्वीट किया.

हालांकि नीतीश की मांग पुरानी है मगर नए अंदाज में इसे उन्होंने सियासत के ‘बाजार’ में उतारा. अपने ट्वीट में नीतीश ने लिखा कि ”बिहार एवं पिछड़े राज्यों की विशेष आवश्यकताओं को अलग दृष्टिकोण से देखे वित्त आयोग”.

इसमें भी उन्होंने केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली और सांसद एनके सिंह का जिक्र किया. यहां भी उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नाम नहीं लिया. इसके बाद से विशेष राज्य का मुद्दा एक बार फिर से सियासी आखाड़े में आ गया.

बयानबाजियों का दौर शुरू हो गया. तीन-चार दिनों से लगातार बयानबाजी हो रही है. बताया जा रहा है कि इसके वजह से बीजेपी का टॉप लीडरशिप अनकम्फर्ट है.

महागठबंधन में थे तारीफ, एनडीए में आए तो आलोचना

इससे पहले जब नीतीश कुमार महागठबंधन में थे तो उन्होंने नोटबंदी की तारीफ की थी. जिसका तब के उनके सहयोगियों ने आलोचना की थी. मगर एनडीए में आने के कुछ महीने बाद नीतीश कुमार ने नोटबंदी की आलोचना की.

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या नीतीश कुमार किसी स्ट्रैटजी पर काम कर रहे हैं? क्या वे बीजेपी दोस्ती तोड़ने की संभावना तलाश रहे हैं?

इसमें अगर आप उनकी राजस्थान के प्रोग्राम को जोड़ दें तो आपको थोड़े-बहुत सबूत भी मिल जाएंगे. ऐसा लगता है कि सुशासन बाबू एक बार फिर से हृदय परिवर्तन की दहलीज पर खड़े हैं.

मोदी सरकार के 4 साल पूरे होने पर नीतीश कुमार ने ट्वीट किया कि ”माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को सरकार के गठन के 4 साल पूरे होने पर बधाई. विश्वास है कि सरकार जनता के अपेक्षाओं पर खरा उतरेगी”.

क्या नीतीश कुमार ‘कदम’ आगे बढ़ा चुके हैं?

नीतीश कुमार ने बांसवाड़ा के कुशलगढ़ मैदान में जेडीयू कार्यकर्ता सम्मेलन किया. वो भी तब जब राजस्थान में विधानसभा चुनाव है. वहां बीजेपी सत्ता में है. वागड़ इलाके में जेडीयू का एक्टिव होना बीजेपी को अच्छा नहीं लगा होगा.

समाजवादी नेता बालेश्वर दयाल का वागड़ इलाका गढ़ रहा है. जॉर्ज फर्नांडिस और बालेश्वर दयाल में मित्रता थी. बड़ी मुश्किल से इस इलाके में बीजेपी अपना पैर जमा पाई है.

1998 में बालेश्वर दयाल के निधन के बाद से पुराने समाजवादी या तो कांग्रेस में चले गए या बीजेपी में. अब नीतीश कुमार नए सिरे से इन्हें गोलबंद करने में जुटे हैं.

राजस्थान जेडीयू के अध्यक्ष दौलतराम पैंसिया ने एलान किया कि उनकी पार्टी प्रदेश के सभी 200 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. ऐसे में बीजेपी के कान खड़े गए. वागड़ में भले ही जेडीयू न जीत पाए, मगर बीजेपी का खेल खराब कर सकती है.

बांसवाड़ा के अपने भाषण में नीतीश कुमार ने केंद्र सरकार की कोई जिक्र नहीं किया बल्कि वो बिहार में अपने किए कामों का गुणगान करते रहे. नीतीश के बदले तेवर से बीजेपी पसोपेश में है.

वैसे भी नीतीश कुमार सहूलियत की राजनीति के उस्ताद माने जाते हैं. ऐसे में सवाल उठता है क्या नीतीश कुमार अपने कदम आगे बढ़ा चुके हैं?

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7 जून को बिहार एनडीए की बैठक

इन सब के बीच 7 जून को बिहार एनडीए की बैठक है. माना जा रहा है कि आगामी चुनाव की रणनीतियों पर चर्चा की जाएगी. मगर बीजेपी की परेशानी दूसरी है.

पिछले कुछ दिनों से नीतीश कुमार के साथ रामविलास पासवान और उपेंद्र कुशवाहा की मुलाकातें हुई है. रामविलास पासवान और उपेंद्र कुशवाहा की नीतीश कुमार से ये नई नवेली ‘दोस्ती’ नागवार गुजर रही है.

अब ये नेता नीतीश कुमार के सुर में सुर भी मिलाने लगे हैं. नीतीश की बयानबाजी और इस खींचतान की जड़ में 2014 का लोकसभा का रिजल्ट है.

2019 की ‘गोटी’ सेट में जुटे

बिहार की 40 सीटों में 31 एनडीए के खाते में गई थी, इसमें बीजेपी के हाथ 22 सीटें लगी. एलजेपी और आरएलएसपी ने 9 सीटें जीती थी. नीतीश कुमार की पार्टी लोकसभा चुनाव में कुछ खास नहीं कर पाई थी.

अब उनको लगता है कि 2019 लोकसभा चुनाव में बीजेपी से अच्छा परफॉर्म करना है तो जीतने के लिए सीटें होनी चाहिए. बीजेपी से ज्यादा सीटें जीतने की भी चुनौती है.

इसी स्ट्रैटजी के तहत नीतीश कुमार ने बिहार की दोनों पार्टियों एलजेपी और आरएलएसपी के नेताओं को अपने पाले में करने की कोशिश में जुटे हैं.

इसमें रामविलास और उपेंद्र कुशवाहा भी अपना-अपना फायदा देख रहे हैं. इन्हें प्रदेश की राजनीति करनी है तो स्टेट में मजबूत जनाधार भी चाहिए. सीटें भी ज्यादा चाहिए ताकि आगे चलकर सत्ता में भागीदारी की सौदेबाजी कर सकें.

यही वजह है कि स्पेशल स्टेटस के मुद्दा के पर बेहिचक ये नीतीश कुमार का समर्थन करते हैं. गठबंधन के अंदर रहकर भी बीजेपी को नसीहतें देने से नहीं चूकते.

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सौदेबाजी के मूड में एनडीए के घटक

बीजेपी के लिए समस्या ये हैं कि स्पेशल स्टेटस के मुद्दे पर ही आंध्र प्रदेश मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू एनडीए से अलग हो गए. अब उसी बात को लेकर नीतीश सियासी गेंद उछाल रहे हैं.

बिहार और आंध्र में बीजेपी को चुनौती नहीं मिल रही बल्कि महाराष्ट्र में शिवसेना ने भी कह दिया है कि वो 2019 में बीजेपी के साथ खड़ी नहीं होगी. उपचुनाव में उसने दिखा भी दिया.

जम्मू-कश्मीर में पीडीपी और पंजाब में अकाली दल भी 2019 में कड़ी सौदेबाजी की तैयारी में है. अकाली दल भी कह चुकी है कि बीजेपी को अपने सहयोगियों से अच्छा सलूक करनी चाहिए.

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